Thursday, May 21, 2009

निशानियाँ.....



शहर-ऐ-दिल की रौनक ले गया कोई,
कुछ सूखे फूल, चंद लम्हे दे गया कोई!

क्या क़यामत सी थी उसकी तसल्लियाँ भी,
मुसलसल बेकरारिया दे गया कोई...
मुसलसल - continuous

वो हैं खुशबू किसी दिल-ऐ-चमन की,
हमे तो बेयाबा कर गया कोई....

चलो माना कोई मरता नहीं जुदाई मैं,
सांसें हैं मगर, जिंदगानी ले गया कोई!

भागती ही रहती है यह ज़िन्दगी भी 'आलम'
थक सा गया हूँ, पर नींदे ले गया कोई !!

आलम सीतापुरी... :)
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