
ए दिल बता इस इश्क मैं क्यों हर चीज़ क़यामत होती है ...
आये ना ग़र मिलने हमसे , मायूस यह तबियत होती है,
हो जाये ग़र वो पह्लून्शी, क्यो अजब यह हालत होती है!
ए दिल बता इस इश्क मैं ...
मिलाते नही ग़र नज़रे हमसे , उनसे ही शिक़ायत होती है
मिल जाये ग़र निगाहें य्क्ल्क्थ , फिर मदहोशी क्यो होती है !
ए दिल बता इस इश्क मैं ...
हर इशारत यह कहती हमसे , उन्हें मेरी ज़रूरत होती हैं,
पूछे ग़र इशारों के मायने, लब पे क्यो ना -ना होती है!
ए दिल बता इस इश्क मैं ...
सुना हैं इश्क मैं शामें कुछ रंगी - रंगी होती हैं,
हम ख्वाब सजाते हैं हर पल , पर नींद क्यो ग़ायब होती हैं।
ए दिल बता इस इश्क मैं ...
मयकशी पे वाईज़ की बातें यों हमे कुबूल होती हैं,
उन् नज़रों से हो मयकशी, क्यो दिल कि चाहत होती हैं !
ए दिल बता इस इश्क मैं ...
~~ आलम सीतापुरी :) Myself ~~
1 comment:
wah wah
yeh to really too good ho gaya
aap to ab pari-pakva shayar ban chuke hain
Keep writing...[:-)]
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