Friday, October 12, 2007

एहसान...

बड़ा एहसान हम फरमा रहे हैं
के उनके खत उन्हें लौटा रहे हैं ...

नही तर्क - ए - मोहब्बत पर वो राज़ी
क़यामत है कि हम समझा रहे हैं...

यकीन का रास्ता तय करने वाले
बोहत तेज़ी से वापिस आ रहे हैं.....

ये मत भूलो के ये लम्हात हमको
बिछड़ने के लिये मिलवा रहे हैं .....

ताजुब हे के इश्क -ओ -आशिकी से अभी
कुछ लोग धोका खा रहे हैं ॥

तुम्हें चाहेंगे जब छिन जाओगे तुम
अभी हम तुम को अर्ज़ां पा रहे हैं....

किसी सूरत इन्हें नफरत हो हम से
हम अपने ऐब खुद गिनवा रहे हैं॥

वो पागल मस्त है अपनी वफ़ा में
मेरी आंखो में आंसू आ रहे हैं ...

दलीलौं से उसे कायेल किया था
दलीलें दे के अब पछता रहे हैं ॥

तेरी बाहों से हिजरत करने वाले
नए माहौल में घबरा रहे हैं...

ये जज्बा -ए -इश्क है या जज्बा -ए -रहम
तेरे आंसू मुझे रुल्वा रहे हैं ...

अजब कुछ रब्त हे तुम से के तुमको
हम अपना जान कर ठुकरा रहे हैं ...

वफ़ा कि यादगारें तक ना होंगे
मेरी जान बस कोई दिन जा रहे हैं ...

~~~जौन औलिया~~

No comments: