Friday, July 11, 2008

पत्थर


One of the finest Nazms by Ahmed Nadeem Quasmi Shahab!!


रेत से बुत न बना ए मेरे अच्छे फनकार!!
(फनकार: artist)
एक लम्हे को ठहर, मैं तुझे पत्थर ला दूँ
मैं तेरे सामने अम्बार लगा दूँ लेकिन
कौन से रंग का पत्थर तेरे काम आयेगा
सुर्ख पत्थर जिसे दिल कहती है बेदिल दुनिया
या वो पत्थराई हुई आँख का नीला पत्थर
जिस में सदीयों के तहय्युर के पड़े हों डोरे
(तहय्युर : astonishment)
क्या तुझे रूह के पत्थर की ज़रूरत होगी
जिस पे हक बात भी पत्थर की तरह गिरती है
इक वो पत्थर है जिसे कहते हैं तहजीब-ऐ-सफ़ेद
उस के मर-मर में सियाह खून झलक जाता है
इक इन्साफ का पत्थर भी तो होता है मगर
हाथ में तेशा-ऐ-ज़र हो तो वो हाथ आता है
(तहजीब-ऐ-सफ़ेद: culture of the elite class; तेशा-ऐ-ज़र

: power of money)

जितने माय्यार हैं इस दौर के सब पत्थर हैं
शेर भी रक्स भी तस्वीर-ओ -घिना भी पत्थर
मेरे इल्हाम तेरा ज़हन ऐ रसा भी पत्थर
इस ज़माने में हर फन का निशाँ पत्थर है
हाथ पत्थर हैं तेरे तेरी जुबां पत्थर है
(मेयार : paradigms; इल्हाम : inspiration)
रेत से बुत न बना ए मेरे अच्छे फनकार!!

Ahmed Nadeem Qasmi

Friday, July 4, 2008

इज़हार..

अहमद नदीम कासमी :One of the most prominent poet of Urdu world। Gulzar Sahab consider him as his his spritual guru and mentor. He mourned his death telling, “I lost my spiritual guru whom I called Baba” . Here is one of the finest classical gazal from this great poet ...
Enjoy the various unsaid feminine signs of love!!


तुझे इज़हार-ऐ मुहब्बत से अगर नफरत है,
तूने होंटों को लरज़ने से तो रोका होता

बे-नियाजी से, मगर कांपती आवाज़ के साथ,
तूने घबरा के मेरा नाम न पूछा होता

तेरे बस में थी अगर मशाल-ऐ-जज़्बात की लौ,
तेरे रुखसार में गुलज़ार न भड़का होता

यूँ तो मुझसे हुई सिर्फ़ आब-ओ हवा की बातें,
अपने टूटे हुए फिकरों को तो परखा होता

यूँही बेवजह ठिठकने की ज़रूरत क्या थी,
दम-ऐ रुखसत मैं अगर याद न आया होता

तेरा घम्माज़ बना ख़ुद तेरा अंदाज़-ऐ-खिराम,
दिल न संभला, तो क़दमों को संभाला होता

अपने बदले मेरी तस्वीर नज़र आ जाती,
तूने उस वक़्त अगर आईना देखा होता

हौसला तुझ को न था मुझ से जुदा होने का,
वरना काजल तेरी आंखों में न फैला होता

~~अहमद नदीम कासमी ~~

Thursday, July 3, 2008

वो कोई और न था


वो कोई और न था चंद खुश्क पत्ते थे,
शजर से टूट के जो फसल-ऐ-गुल पे रोये थे
(खुश्क: dry; चंद: few; शजर: tree; फसल-ऐ-गुल : season of flowers)

अभी अभी तुम्हें सोचा तो कुछ न याद आया,
अभी अभी तो हम एक-दूसरे से बिछडे थे

तुम्हारे बाद चमन पर जब एक नज़र डाली,
कली कली में खिजां के चिराग जलते थे (my fav)
(खिजां : autumn)

तमाम उम्र वफ़ा के गुनाह गार रहे,
ये और बात के हम आदमी तो अच्छे थे (my fav)

शब्-ऐ-खामोश को तन्हाई ने जुबां दे दी,
पहाड़ गूँजते थे दश्त सन-सनाते थे
(शब्-ऐ-खामोश: silent night; जुबां : voice; दश्त : desert)

वो एक बार मरे जिन को था हयात से प्यार
जो जिंदगी से गुरेज़ाँ थे रोज़ मरते थे (my fav)
(हयात: life; गुरेज़ाँ : escapists)

नए ख़याल अब आते हैं ढल के जेहन में,
हमारे दिल में कभी खेत लह- लहाते थे
(जेहन : mind)

ये इर्तिका का चलन है के हर ज़माने में,
पुराने लोग नए आदमी से डरते थे
(इर्तिका : progressive)

“नदीम” जो भी मुलाक़ात थी अधूरी थी ,
के एक चेहरे के पीछे हज़ार चेहरे थे (my fav)

~~अहमद नसीम कासमी~~

Wednesday, July 2, 2008

उसके पहलू से...



उसके पहलू से लग के चलते हैं
हम कहीं टालने से टलते हैं !!

मैं उसी तरह तो बहलता हूँ
और सब जिस तरह बहलते हैं !!

वोह है जान अब हर एक महफिल की
हम भी अब घर से कब निकलते हैं !! (my fav)

क्या तक़ल्लुफ़ करें ये कहने में
जो भी खुश है, हम उस से जलते हैं !! (my fav)

है उसे दूर का सफर दरपेश ,
हम संभाले नहीं संभलते हैं !!

है अजब फैसले का सेहरा भी
चलना पड़िये तो पाँव जलते हैं !! (my fav)

हो रहा हूँ मैं किस तरह बरबाद ,
देखने वाले हाथ मलते हैं !! (my fav)

तुम बनो रंग, तुम बनो खुश्बू
हम तो अपने सुखन में ढलते हैं !! (my fav) ()
~~जान एलिया~~