Thursday, July 3, 2008

वो कोई और न था


वो कोई और न था चंद खुश्क पत्ते थे,
शजर से टूट के जो फसल-ऐ-गुल पे रोये थे
(खुश्क: dry; चंद: few; शजर: tree; फसल-ऐ-गुल : season of flowers)

अभी अभी तुम्हें सोचा तो कुछ न याद आया,
अभी अभी तो हम एक-दूसरे से बिछडे थे

तुम्हारे बाद चमन पर जब एक नज़र डाली,
कली कली में खिजां के चिराग जलते थे (my fav)
(खिजां : autumn)

तमाम उम्र वफ़ा के गुनाह गार रहे,
ये और बात के हम आदमी तो अच्छे थे (my fav)

शब्-ऐ-खामोश को तन्हाई ने जुबां दे दी,
पहाड़ गूँजते थे दश्त सन-सनाते थे
(शब्-ऐ-खामोश: silent night; जुबां : voice; दश्त : desert)

वो एक बार मरे जिन को था हयात से प्यार
जो जिंदगी से गुरेज़ाँ थे रोज़ मरते थे (my fav)
(हयात: life; गुरेज़ाँ : escapists)

नए ख़याल अब आते हैं ढल के जेहन में,
हमारे दिल में कभी खेत लह- लहाते थे
(जेहन : mind)

ये इर्तिका का चलन है के हर ज़माने में,
पुराने लोग नए आदमी से डरते थे
(इर्तिका : progressive)

“नदीम” जो भी मुलाक़ात थी अधूरी थी ,
के एक चेहरे के पीछे हज़ार चेहरे थे (my fav)

~~अहमद नसीम कासमी~~

3 comments:

डॉ .अनुराग said...

तमाम उम्र वफ़ा के गुनाह गार रहे,
ये और बात के हम आदमी तो अच्छे थे

ek aor aafreen sher....subhanaalah...gajab.yar..

Anonymous said...

bhut sundar kavita. likhate rhe.

रंजू भाटिया said...

“नदीम” जो भी मुलाक़ात थी अधूरी थी ,
के एक चेहरे के पीछे हज़ार चेहरे थे ...

बहुत बहुत सुंदर ..दिल को छु गया यह क्यूंकि सच यही है जिंदगी का ..बहुत खूब ...