Wednesday, June 4, 2008

सवाल...

तू बता दिल-ऐ- बेताब, कहाँ आते हैं ,
हमको खुश रहने के आदाब कहाँ आते हैं |

मैं तो यक्मुश्त उसे सौप दूँ सब-कुछ लेकिन,
एक मुट्ठी में मेरे ख्वाब कहाँ आते हैं |

मुद्दतों बाद तुझे देख के दिल भर आया ,
वरना शहरों में सैलाब कहाँ आते हैं |

मेरी बेदार निगाहों में अगर भूले से
नींद आए भी तो अब ख्वाब कहाँ आते हैं|

शिद्दत ऐ -दर्द है या कसरत ऐ -मय नोशी है ,
होश में अब तेरे बेताब कहाँ आते हैं |

हम किसी तरह तेरे दर पे ठिकाना कर लें ,
हम फकीरों को ये आदाब कहाँ आते हैं |

सर-बसर जिन में फ़क़त तेरी झलक मिलती थी ,
अब मयस्सर हमे वो ख्वाब कहाँ आते हैं |

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