हुस्न जब मेहबान हो तो क्या कीजिये,
इश्क की मग्फिरत की दुआ कीजिये |
(मेहरबान : generous; मग्फिरत : pardon, forgiveness)
इस सलीके से उनसे गिला कीजिये ,
जब गिला कीजिये हंस दिया कीजिये |
दूसरों पर अगर तब्सिरा कीजिये ,
सामने आईना रख लिया कीजिये |
(तब्सिरा : criticism)
आप सुख से हैं तर्क-ऐ-ताल्लुक के बाद ,
इतनी जल्दी न ये फैसला कीजिये |
(तर्क ऐ -ताल्लुक : breaking off)
कोई धोखा न खा जाए मेरी तरह
ऐसे खुल के न सबसे मिला कीजिये
~~खुमार बाराबंकवी ~~
Friday, June 6, 2008
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
3 comments:
सुन्दर प्रस्तुति
आप सुख से हैं तर्क-ऐ-ताल्लुक के बाद ,
इतनी जल्दी न ये फैसला कीजिये |
kya bat hai....
कोई धोखा न खा जाए मेरी तरह
ऐसे खुल के न सबसे मिला कीजिये
vah yar chaa gaye tum to....
bahut khubsurat.
---
ultateer
Post a Comment