Sunday, June 15, 2008

क्या तुम.....



The beauty of this Gazal is its simplicity yet complelling pessimitic reasons present in the next line of sher which is in form of conversation.. simply superb!!

गाहे गाहे बस अब यही हो क्या?
तुमसे मिलकर बहुत खुशी हो क्या ?

मिल रही हो बड़े तपाक के साथ....
मुझको यक्सर भुला चुकी हो क्या?

याद हैं अब भी अपने ख्वाब तुम्हें.....
मुझसे मिलकर उदास भी हो क्या?

बहुत नजदीक आती जा रही हो ....
बिछड़ने का इरादा कर लिया है क्या ?


बस मुझे यूँही एक ख्याल आया......
सोचती हो तो सोचती हो क्या?

अब मेरी कोई ज़िंदगी ही नहीं... (my fav)
अब भी तुम मेरी ज़िंदगी हो क्या ?

क्या कहा, इश्क जाविदानी है... (my fav)
आखरी बार मिल रही हो क्या?

हाँ, फज़ा यहाँ की सोयी सोयी सी है...
तुम बहुत तेज़ रौशनी हो क्या?

मेरे सब तंज़ बे-असर ही रहे ... (my fav)
तुम बहुत दूर जा चुकी हो क्या?

दिल में अब सोज़-ऐ-इंतिज़ार नहीं (my fav)
शम्म-ऐ-उम्मीद ! बुझ गई हो क्या?

~~जौन एलिया~~

2 comments:

Realty Rider said...

My Dear Friend it's awesome .
Name ko to pata nahi but fame u will definitely get.

Rish said...

Abe confuse mat hona Realty Rider mai hi hu.