Friday, June 6, 2008

क्या कीजिये...

हुस्न जब मेहबान हो तो क्या कीजिये,
इश्क की मग्फिरत की दुआ कीजिये |
(मेहरबान : generous; मग्फिरत : pardon, forgiveness)

इस सलीके से उनसे गिला कीजिये ,
जब गिला कीजिये हंस दिया कीजिये |

दूसरों पर अगर तब्सिरा कीजिये ,
सामने आईना रख लिया कीजिये |
(तब्सिरा : criticism)

आप सुख से हैं तर्क-ऐ-ताल्लुक के बाद ,
इतनी जल्दी न ये फैसला कीजिये |
(तर्क ऐ -ताल्लुक : breaking off)

कोई धोखा न खा जाए मेरी तरह
ऐसे खुल के न सबसे मिला कीजिये
~~खुमार बाराबंकवी ~~

3 comments:

आशीष कुमार 'अंशु' said...

सुन्दर प्रस्तुति

डॉ .अनुराग said...

आप सुख से हैं तर्क-ऐ-ताल्लुक के बाद ,
इतनी जल्दी न ये फैसला कीजिये |
kya bat hai....

कोई धोखा न खा जाए मेरी तरह
ऐसे खुल के न सबसे मिला कीजिये
vah yar chaa gaye tum to....

Amit K Sagar said...

bahut khubsurat.
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ultateer