Monday, June 30, 2008

की......मैं



बदन के दोनों किनारों से जल रहा हूँ मैं ,
की छू रहा हूँ तुझे, और पिघल रहा हूँ मैं | (my fav)

तुझी पे ख़त्म है जानां मेरी ज़वाल की रात,
तू अब तुलु भी हो जा, की ढल रहा हूँ मैं | (my fav)
(ज़वाल : nadir; तुलु : appearing)

बुला रहा है मेरा जामा-जेब मिलने को
तो आज पैरहन-ऐ-जान बदल रहा हूँ मैं |
(पैराहन-ऐ-जान: clothes of the soul)

घुबार-ऐ-रहगुज़र का ये हौसला भी तो देख,
हवा-ऐ-ताज़ा! तेरे साथ चल रहा हूँ मैं |
(घुबार-ऐ-रहगुज़र : dust of the path; हवा-ऐ-ताज़ा : fresh breeze)

मैं ख्वाब देख रहा हूँ के वो पुकारता है ,
और अपने जिस्म से बाहर निकल रहा हूँ मैं | (my fav)

~~इरफान सिद्दीकी~~

5 comments:

Anonymous said...

bhut khub. likhate rhe.

डॉ .अनुराग said...

घुबार-ऐ-रहगुज़र का ये हौसला भी तो देख,
हवा-ऐ-ताज़ा! तेरे साथ चल रहा हूँ मैं |
(घुबार-ऐ-रहगुज़र : dust of the path; हवा-ऐ-ताज़ा : fresh breeze)

मैं ख्वाब देख रहा हूँ के वो पुकारता है ,
और अपने जिस्म से बाहर निकल रहा हूँ मैं |

sab sher apne aap me mukammAL hai kisko kisko behtareen kahe...lajavaab...

Anonymous said...

kya baat hai!!
shero shayari can b so meaningful!!! :D
seems like shayar khud m khud sama gaye hai apni lines mein...wah wah...kya baat hai ..kya baat hai!! :D

रंजू भाटिया said...

बेहतरीन कलेक्शन है आपके पास .. किसी एक को अच्छा कहना मुश्किल होगा ..पढ़वाते रहे शुक्रिया

Anonymous said...

शाएरी का बहूत उम्दः कलेक्शन है आप के पास - शुक्रिया